युद्ध की आहट से कृषि पर असर, खाद सप्लाई पर खतरा
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा है कि खरीफ सीजन की बुवाई शुरू होने से ठीक पहले भारत में खाद की कमी और खाद्य मुद्रास्फीति (महंगाई) का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है।
सप्लाई चेन पर 'युद्ध' की मार
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक खाद आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस संकट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य का गतिरोध: भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 35 प्रतिशत उर्वरक खाड़ी देशों से आयात करता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यापारिक बाधाओं के कारण यह सप्लाई लगभग ठप हो गई है।
- शिपिंग लागत में उछाल: तनाव की वजह से समुद्री जहाजों का बीमा अत्यधिक महंगा हो गया है और टैंकरों की आवाजाही में 90 से 95 प्रतिशत तक की गिरावट आई है।
- बजट पर दबाव: भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खाद सब्सिडी हेतु 18.6 अरब डॉलर का प्रावधान किया है, लेकिन सप्लाई न होने की स्थिति में यह भारी बजट भी कम पड़ सकता है।
घरेलू उत्पादन में बाधा और गैस की कमी
मैक्सिमो टोरेरो के अनुसार, भारत के भीतर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है:
- क्षमता का अभाव: गैस की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण भारत के घरेलू खाद कारखाने अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। वर्तमान में ये प्लांट केवल 60 प्रतिशत क्षमता पर ही संचालित हो रहे हैं।
- पंजाब के प्लांट्स: नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) के प्लांट शुरू तो किए गए हैं, लेकिन तकनीकी और कच्चे माल की बाधाओं के कारण उत्पादन लक्ष्य से काफी पीछे है।
खरीफ सीजन और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
मई से शुरू होने वाली खरीफ की बुवाई पर इस संकट का सीधा असर पड़ने वाला है:
- उत्पादन में कमी: खाद महंगी होने या न मिलने पर किसान इसका सीमित उपयोग करेंगे, जिससे चावल, मक्का और गेहूं जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है।
- मौसम की दोहरी मार: साल 2026 में मानसून के सामान्य से कम रहने की 60 प्रतिशत संभावना जताई गई है, जो स्थिति को और अधिक विकट बना सकता है।
- वैश्विक महंगाई: वैश्विक स्तर पर खाद की कीमतें पहले ही 50 से 80 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। ईंधन महंगा होने से सिंचाई और फसलों की ढुलाई का खर्च भी बढ़ेगा।

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