शीतला सप्तमी में इन सामग्री की पड़ेगी जरूरत
शीतला सप्तमी या बसौड का पर्व 10 मार्च दिन मंगलवार को मनाया जाएगा, हर वर्ष यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है. हालांकि कुछ जगहों पर सप्तमी तिथि की पूजा अर्चना की जाती है और कुछ जगहों पर अष्टमी तिथि को पूजन करते हैं. मां शीतला को समर्पित इस पर्व में बासी भोजन का माता को भोग लगाया जाता है और घरों में भी बासी भोजन किया जाता है. मान्यता है कि मां शीतला की पूजा करने से चेचक, दाने-फुंसी और अन्य संक्रामक रोगों से परिवार की रक्षा होती है. अगर आप 10 मार्च को शीतला सप्तमी का पर्व मना रहे हैं तो पूजा से संबंधित चीजें अभी से इकट्ठा कर लें ताकि पूजन में कोई सामान ना होने से व्यवधान ना आए. यहां जानें संपूर्ण शीतला सप्तमी पूजा लिस्ट…
कैसा है माता शीतला का स्वरूप?
धार्मिक ग्रंथों में मां शीतला को गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू, सूप और जल से भरा कलश धारण किए हुए बताया गया है. झाड़ू को साफ-सफाई का प्रतीक माना जाता है, जबकि कलश का जल रोगों को शांत करने का संकेत देता है. इसलिए इस पर्व को स्वच्छता और स्वास्थ्य से भी जोड़कर देखा जाता है.
शीतला सप्तमी (बसौड़ा) की पूजा सामग्री लिस्ट
रोली और हल्दी
अक्षत (चावल)
कुमकुम
फूल और फूलों की माला
धूप और दीपक
चने की दाल
घी या तेल
कपूर
नारियल
सुपारी और पान
कलश और जल
गंगाजल
मौली (कलावा)
गुड़ और बताशे
दही और दूध
हलवा या मीठा प्रसाद
एक दिन पहले बनाया हुआ भोजन (पूड़ी, पूरी-सब्जी, मीठे चावल आदि)
झाड़ू (मां शीतला का प्रतीक माना जाता है)
बासी भोजन रखने के लिए थाली
क्या है बसौड़ा की परंपरा?
शीतला सप्तमी को कई जगहों पर बसौड़ा कहा जाता है. बसौड़ा का अर्थ होता है बासी या एक दिन पहले बनाया हुआ भोजन. इस दिन घरों में चूल्हा या गैस नहीं जलाया जाता. इसके बजाय एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख लिया जाता है और अगले दिन उसी ठंडे भोजन को मां शीतला को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि मां शीतला को ठंडा भोजन प्रिय है, इसलिए उन्हें ठंडे प्रसाद का भोग लगाया जाता है. बसौड़ा के प्रसाद में आमतौर पर पूड़ी, मीठे चावल, कढ़ी, सब्जी, दही, गुड़ और अन्य व्यंजन शामिल होते हैं.

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